शीर्ष तीन विजेता एवं उनकी रचना
प्रथम स्थान : श्रीमती पूनम शुक्ला जी
रचना :
कविता-मैं, तुम और मेरी डायरी
आज बड़ा ही सुहावना दिन है।
कोहरे की धुंध के बीच सूरज दिख रहा है।
अदरक वाली चाय की चुस्की के साथ,
लेखक कुछ अपनी डायरी में लिख रहा है।।
लिखते-लिखते वह कहीं खो गया,
शायद उसके मन रुपी कोरे कागज में, कुछ भाव उभर रहे हैं।
चेहरे पर मुस्कान खिल गयी, दिल की कलम से शब्द निखर रहे हैं।
मन की चंचलता के मोती को पिरोना।
प्रेम की लड़ी (बिस्किट) को चाय में डुबोना।।
बिस्किट का नम होकर टूटकर घुल जाना,
उफ... कहकर बाकी बिस्किट का स्वाद लेना।
गरमागरम चाय के बाद तंद्रा टूट जाना,
फिर अपनी साथी कलम उठाकर डायरी पर लिखना ॥
कलम व डायरी ही कवि के हथियार है।
मजबूत व टिकाऊ और मददगार है।।
फिर क्या...
आज मैं और मेरी तन्हाई की बारी है।
उठाई लेखनी व डायरी बड़ी प्यारी है।
कुछ अच्छा सा लिखने का मन है।
बना डाली एक कविता जिसमे अद्भुत बचपन है।
अनोखा है बचपन जो खुशियों का पिटारा है।
उसे ही अपनी डायरी में संवारा है।
छोटी - छोटी अठखेलियों को संजोकर,
शब्दों के मोती की माला अधारा है।
आज बड़ा ही सुहावना मौसम है।
मैं, मेरी खुशियों की डायरी और मेरी चुलबुली कलम हैं।
– पूनम शुक्ला
द्वितीय स्थान : श्री मनीषी सिन्हा जी
रचना :
मैं तुम और मेरी डायरी
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निस्तब्ध स्याह रातों में, धीमी धीमी बरसातों में
साँझ की धूमिल आभा में, एकांत हालातों में ।
होते हैं अक्सर साथ साथ, मैं तुम और डायरी
जहाँ शब्द स्वयं चुनते कविता, गज़ल, शायरी ॥
मुझसे मिलने आती जब बीते लम्हों की बारातें
हर श्वास में गहराती संवेदनाओं की बरसातें ।
आँखों की झिलमिल नमी में स्मृति परछाइयाँ
मेरी कलम उकेरती पन्नों पर अनकही तन्हाइयाँ ॥
तुम पास नहीं मेरे पर, एहसासों में बने रहते हो
पंक्तियों के दरमियाँ चुपचाप विचरते रहते हो ।
खुलती है खामोशियों की परतें एक एक कर
पन्नों पर फैल जाती है अंतरंग मनोभाव डगर ॥
हँसते मुस्कुराते पल कभी गुदगुदाते हैं मन को
मधुर स्वप्न पुनर्मिलन के, बहलाते हैं नयन को ।
एक जन्म की ही तो नहीं होती दिलों की यारी
भावुक क्षणों के अंबार सहेज लेती मेरी डायरी ॥
सूनापन जीवन का जब शब्दों में ढल जाता है
एकाकी मन स्वयं अपनी गाथा गुनगुनाता है ।
मैं, तुम और डायरी गाते अलग कोई राग नहीं
प्रेमानुरक्त हृदय का अलग कोई संवाद नहीं ॥
– मनीषी सिन्हा
तृतीय स्थान : श्री अमित श्रीवास्तव जी
रचना :
"मैं तुम और डायरी"
तुम, मैं, और डायरी की कहानी,
तीन दिल, एक ही भावना अनजानी।
पन्नों पर लिखते, अपने दिल की बात,
डायरी सुनती, मेरी सारी रात।
तुम हो साथी, मेरे जीवन के,
डायरी है मेरा, सच्चा साथी।
तुमसे बातें, डायरी में लिखता,
अपने दिल की, गहराइयों में डूबता।
तुम हो मित्र, मेरे अनमोल रतन,
डायरी है मेरा, सच्चा रतन।
तुमसे मिलकर, डायरी में लिखता,
अपने जीवन की, कहानी बनाता।
तुम हो प्यार, मेरे जीवन का,
डरी है मेरा, सच्चा प्यार।
तुमसे बातें, डायरी में लिखता,
अपने दिल की, गहराइयों में डूबता।
तुम, मैं, और डायरी की कहानी,
तीन दिल, एक ही भावना अनजानी।
पन्नों पर लिखते, अपने दिल की बात,
डायरी सुनती, मेरी सारी रात।
तुम हो साथी, मेरे जीवन के,
डायरी है मेरा, सच्चा साथी।
तुमसे मिलकर, डायरी में लिखता,
अपने जीवन की, कहानी बनाता।
तुम हो मेरा, सच्चा मित्र,
डायरी है मेरा, सच्चा रतन।
तुमसे बातें, डायरी में लिखता,
अपने दिल की, गहराइयों में डूबता।
कृत - अमित श्रीवास्तव
* चतुर्थ स्थान ; मधु गुप्ता जी
रचना :
मैं तुम और मेरी डायरी:
खामोश पड़े इन पन्नों पर मैं तेरा नाम स्याही से रचती हूँ,
सखी बन गई डायरी मेरी, जिसमें तेरी मुस्कान लिखती हूँ
गीत, गज़ल और अनकहे जज़्बात मैं लिखती हूँ,
"कहना न किसी से", चुपके से डायरी से कहती हूँ।
होती हूँ तन्हा तो खोकर तुममें, बातें उसे शरमा कर कहती हूँ,
भाव सभी लिख देती, शिकायतें तेरी छोटी-बड़ी लिखती हूँ।
बारिश, मौसम और तेरे साथ गुज़ारे लम्हे लिखती हूँ,
पन्नों पर बिखरी स्याही के अक्षरों में,महसूस तुझे करती हूँ।
तेरी रार और अपनी तारीफ़ के जमकर कसीदे कसती हूँ,
अकेली राहों में भी,बपन्नों पर तेरी आहट छिप कर लिखती हूँ।
चाँदनी रात की खुली हवा में,तेरे हाथों का स्पर्श लिखती हूँ,
पुकारा जो तुमने मुझे 'चाँद', तो थोड़ा खुद को भी लिखती हूँ।
खिड़की से झाँके जो कोई, तो तेरी पुरानी आदत लिखती हूँ,
गालों की लाली छिपी, मिलन की वो मुस्कान मैं लिखती हूं
बेवजह, बेमतलब बस, तेरा नाम चुपके से लिखती हूँ,
सोचकर हँस देती डायरी, जब पागलपन की हद लिखती हूँ।
नोक-झोंक में अपनी गलती अक्सर मैं छुपा कर लिखती हूँ,
आँखें बंद कर सदा, मन के दर्पण से तेरी छवि लिखती हूँ।
मेरे एकांत को तुम और डायरी ही स्पंदित करते हो,
जहाँ मैं हँसी-ठिठोली और भावनाओं की लतिका लिखती हूँ।
– मधु गुप्ता "अपराजिता"
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